छत्तीसगढ़ के जांजगीर -चाम्पा जिला खेती धान व् दलहन की पैदावार के लिए छत्तीसगढ़ ही नहीं पुरे भारत देश में प्रशिद्ध है . पर यहाँ के किसानों को कहा पता था कि ये प्रशिद्धि आने वाले समय में उनको अपनी जमीन से बेदखल करने वाली है . जिस जमीन पर हम अच्छे किश्म के धान उगने की घमंड करते थे, आज वहां जबरदस्ती प्लांट से बिजली बनकर बड़े शहरों में जाने के लिए बड़े टॉवर के अंधाधुन खम्भे खड़े किये जा रहे है.
खम्भे खड़े करने जिस बेदर्दी से जमीन की खुदाई की जाती है हमारी आँखों से आंसू निकल रहेँ है जिसे हम कई सालो से पोंछ नहीं पाएंगे .
मुझे मेरे पिता ने बताया था कि किसी भी तरह से उपरी मिटटी को हाथ से जाने मत देना बड़ी मुश्किल से बनती है ये मिटटी . हो सके तो तालाब सुखाते वक्त वहां मिट्टी हर साल पालना .
हमने अपनी खेती में मिटटी किस तरह से बनती है देखा है पर खोदने वालों को पता नहीं. उनको बस खोदना है ताकि जल्दी से टावर का पाया लगाने को जमीन के नीचे सीमेंट और लोहे से कांक्रीट कर सके .
इसके विपरीत जब हमसे लगता कि पडोसी किसान थोडा भी मिटटी हमारी खेत से ले जाते थे तो आपसी रंजिश इतनी हो जाती थी की मर जाने या मार देने की नौबत भी आ जाती .खैर
हम कोई विकाश के विरोध में नहीं है पर यह कैसा विकाश जो हमें विनाश करके किया जा रहा है . हर उद्योग से प्रभावितों को जमीन का मुआवजा है पर इसमें कोई मुआवजा नहीं क्योंकि यह तो जन हित का कार्य है।
कई साल पहले हमारी आधी जमीन हसदेव नहर आने के कारण चली गयी सोचा सिंचाई होने से जा रही जमीन के फसल की भरपाई हो जाएगी पर उस समय गलत सोचा था . अब बचे जमीन पर से टावर लाइन गुजरने से पूरा ख़तम .
मेरे सवालों का जवाब तो देना ही होगा -
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| खेत में गिट्टी और रेता ही |
क्या छत्तीसगढ़ में किसानों को ही जन हित कार्य करने का कोई ठेका है ?
क्या सरकार सिर्फ बिजली से ही चल सकती है?
क्या विकाश किसी को विनाश करके ही किया जा सकता है ?
क्या छत्तीसगढ़ को इतनी बिजली की जरुरत है की खेती को तबाह करके भी किया जाना उचित है ?
खेती की रकबा घटने से जो खाने की कमी होगी उसकी भरपाई कैसे करेंगें ?
आखिर ये सरकार किसके लिए है किसान जो बर्बाद हो रहे है ?


